काल की परिभाषा
काल की परिभाषा
संसार के सभी दृश्य पदार्थ अर्थात् सभी ज्ञानेंद्रियों से जाने जा सकने वाले पदार्थ परिवर्तनशील है। इसी परिवर्तन के ज्ञान का जो हेतु है उसी को काल कहते हैं। जगत के परिणाम के मूल में काल की शक्ति क्रिया करती है। चंचलताशून्य चित्तके सामने निरावरण प्रकाश का आविर्भाव होने पर विश्व में कुछ भी अप्रत्यक्ष नहीं रह सकता। तब सब कुछ वर्तमान रूप में उपलब्ध हो सकता है। काल परिणाम को लक्षण-परिणाम कहते हैं। अनागत, वर्तमान और अतीत -ये तीन लक्षण हैं। इनका त्रिकाल ( तीन कॉल )- के नाम से वर्णन किया जाता है। बुद्धि के बाहर कॉल नहीं है, क्रम है। जिसको ब्रह्मांड कहा जाता है, वह काल के आधीन है; क्योंकि इसकी भी सृष्टि, स्थिति और संहार है। ब्रह्मांड की संख्या असंख्य पर सर्वत्र यही नियम है।
संसार के सभी दृश्य पदार्थ अर्थात् सभी ज्ञानेंद्रियों से जाने जा सकने वाले पदार्थ परिवर्तनशील है। इसी परिवर्तन के ज्ञान का जो हेतु है उसी को काल कहते हैं। जगत के परिणाम के मूल में काल की शक्ति क्रिया करती है। चंचलताशून्य चित्तके सामने निरावरण प्रकाश का आविर्भाव होने पर विश्व में कुछ भी अप्रत्यक्ष नहीं रह सकता। तब सब कुछ वर्तमान रूप में उपलब्ध हो सकता है। काल परिणाम को लक्षण-परिणाम कहते हैं। अनागत, वर्तमान और अतीत -ये तीन लक्षण हैं। इनका त्रिकाल ( तीन कॉल )- के नाम से वर्णन किया जाता है। बुद्धि के बाहर कॉल नहीं है, क्रम है। जिसको ब्रह्मांड कहा जाता है, वह काल के आधीन है; क्योंकि इसकी भी सृष्टि, स्थिति और संहार है। ब्रह्मांड की संख्या असंख्य पर सर्वत्र यही नियम है।
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