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Showing posts from October, 2019
हमारे अस्तित्व का वह भाग हमारा हृदय है, जिसके आधार पर हमारा अस्तित्व टिका है, वैसे ही जैसे किसी वृत्त का केंद्र बिंदु होता है। जिसके बिना वृत्त का अस्तित्व नहीं बन सकता। यद्यपि वृत्त के केंद्र बिंदु की लंबाई चौड़ाई मोटाई नहीं होती है फिर भी उसके बिना वृत्त की परिधि की कल्पना भी नहीं हो सकती है ऐसे ही हमारा हृदय भी है। बिना हृदय के हमारा आस्तित्व नहीं हो सकता।

परमानंद की स्थिति

आखें स्थिर होने से शरीर स्थिर होता है, शरीर स्थिर होने से मन स्थिर हो जाता है, मन स्थिर होने से प्राण स्थिर हो जाता है, प्राण स्थिर होने से हमारा ईश्वर में एकात्म हो जाता है और यही स्थिति परम शांन्ति की स्थिति होती है जो कि परमानन्द की स्थिति होती है।

हमारा हृदय में

हमारे अस्तित्व का वह भाग हमारा हृदय है, जिसके आधार पर हमारा अस्तित्व टिका है, वैसे ही जैसे किसी वृत्त का केंद्र बिंदु होता है। जिसके बिना वृत्त का अस्तित्व नहीं बन सकता। यद्यपि वृत्त के केंद्र बिंदु की लंबाई चौड़ाई मोटाई नहीं होती है फिर भी उसके बिना वृत्त की परिधि की कल्पना भी नहीं हो सकती है ऐसे ही हमारा हृदय भी है। बिना हृदय के हमारा आस्तित्व नहीं हो सकता।

प्रमाण युक्त बुद्धि

व्यवसायात्मिका बुद्धि       व्यवसायात्मिका बुद्धि या निश्चयात्मिका बुद्धि या प्रमाणयुक्त बुद्धि या स्थिर विचार युक्त बुद्धि, यह सभी कथन एक ही हैं। प्रमाणयुक्त बुद्धि जो सही तर्कों पर आधारित हो पूरे संसार में सभी स्थानों पर और सभी लोगों में एक ही होती है। जबकि अव्यवसायात्मिका बुद्धि या अनिश्चयात्मिका बुद्धि अर्थात जो बुद्धि प्रमाणित न हो वह अस्थिर विचार वाले  मनुष्यों की बुद्धियां निश्चय ही बहुत भेद वाली और अनंत होती हैं।( गीता-२/४१) प्रमाण युक्त बुद्धि

फल की प्राप्ति (सिद्धी)कैसे?

फल की प्राप्ति (सिद्धी)         किसी फल की प्राप्ति (सिद्धी) अधिकारी की अपेक्षा करती है, और अधिकारी वही बनता है जिसमें उस कार्य, फल प्राप्ति या सिद्धी के लिए तीव्र अभिप्सा होती है। तीब्र अभिप्सा  क्या होती है? तीब्र अभिप्सा ऐसी स्थिति है जैसे कोई मजबूत व्यक्ति किसी कमजोर व्यक्ति को पानी में डुबो रहा हो और वह कमजोर व्यक्ति अपने को अंतिम सांस तक उस स्थिति से निरन्तर बाहर निकलने का जो प्रयास कर रहा हो  वही स्थिति  तीब्र अभीप्सा कहलाती है।
आधुनिक विज्ञान क्या है?      आधुनिक विज्ञान के बारे में जैसा कि हम पूर्ण विश्वास के साथ यह मानते हैं कि यह पूर्ण सत्य ज्ञान है, जबकि यह सत्य नहीं है। क्योंकि आधुनिक विज्ञान के अनुसार किसी वैज्ञानिक सिद्धान्त या परिकल्पना की सबसे बडी विशेषता यह है कि उसे असत्य सिद्ध करने की गुंजाइश (scope) होनी चाहिये। जैसा कि विज्ञान की परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है।      " विज्ञान वह व्यवस्थित ज्ञान या विद्या है जो विचार, अवलोकन, अध्ययन और प्रयोग से मिलती है, जो किसी अध्ययन के विषय की प्रकृति या सिद्धान्तों को जानने के लिये किये जाते हैं। ... इस प्रकार कह सकते हैं कि किसी भी विषय के क्रमबद्ध ज्ञान को विज्ञान कहते है।" इसमें या कहीं भी नहीं कहा गया है कि जो सिद्धांत या निष्कर्ष निकलते हैं वह सदा सत्य हैं। जबकि वेदों की विचारधारा त्रिकाल सत्य है। इसमें दर्शाए गए बुनियादी आदर्श हर परिस्थिति तथा हर काल में अपनाने योग्य है।

ब्रह्म एवं जीव

ब्रह्म  एवं  जीव       भूमिरापोऽनलो  वायु: खं मनो बुद्धिरेव च ।        अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना  प्रकृतिरष्टधा ।।   अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।      जीवभूतां महाबाहो  ययेदं धार्यते जगत्।।       ( गीता- ७/४-५)      अर्थात् :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी- इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदोंवाली तो अपरा अर्थात्  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो!  इससे दूसरी को,  जिससे यह संपूर्ण जगत् धारण किया जाता है, मेरी जीव रूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान।    टिप्पणी-- यही नौ प्रकार की प्रकृति जीव के पास भी है केवल अंतर इतना है की ईश्वर भूमा है, जबकि जीव अल्प है। यह ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे ईश्वर को यदि सागर माना जाए तो जीव उसकी एक बूंद के कण के समान है।

मंत्र पाठ करें

गति से ऊर्जा पैदा होती है। अतः मंत्र पाठ (अक्षरों का विस्फोट करना) से मंत्रानुसार ऊर्जा पैदा होती है, जो अभीष्ट मंत्र से अभीष्ट फल प्राप्त कराती है। मंत्र पाठ बिना शिक्षा के नहीं हो सकता।शिक्षा का अर्थ पाणिंनी की शिक्षा से है जिससे वर्णों का सही उच्चारण ज्ञान प्राप्त होता है।

ईश्वर

ईश्वर का निर्गुण रूप अक्षर 'ॐ' है, और ईश्वर का सगुण रूप समस्त ब्रह्मांड है।

मेधा सूक्त

मेधा सूक्त --          यजुर्वेद के इन मंत्रों का जो बालक, विद्यार्थी या जो भी मनुष्य प्रातः एवं प्रतिदिन विद्याध्ययन से पूर्व यथा विधि पाठ करता है वह मेंधावी होता जाता है। (मेधा वह बुद्धि है जो सुने, पढ़े और देखे हुए को धारण करती है, और समय पर प्रगट करती है)।    सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम।    सनिं     मेधामयासिषं     स्वाहा ।।१३।।    या   मेधां   देवगणाः   पितरश्चोपासते।    तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।१४।।    मेधा मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः।    मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा।।१५।।    इदं  मे  ब्रह्म  च  क्षत्रं चोभे  श्रियमश्नुताम्।    मयि देवा दधतु श्रियमुत्तमां तस्यै ते स्वाहा ।।१६।।         (शु०यजु० ३२/१३-१६)

ज्ञान योग

 ज्ञान योग      ज्ञान योग, कर्म योग तथा भक्ति योग में क्या अंतर है ?ज्ञान योग में ज्ञान की प्रमुखता होती है, और कर्म योग तथा भक्ति योग में एक निश्चय की प्रमुखता होती है।(गीता)

अर्थ ज्ञान सहित वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन

  अर्थ ज्ञान सहित वेदादि शास्त्रों का अध्ययन।     वेदादी-शास्त्रों का अध्ययन अर्थ-ज्ञान सहित करना चाहिए, क्योंकि जैसे अग्नि के बिना सूखे ईधन में दाह और प्रकाश नहीं होता है, वैसे ही अर्थ-ज्ञान व उसके भाव को जाने बिना वेदादि-शास्त्र अध्ययन भी ज्ञान प्रकाश रहित रहता है। और वह अविद्या रूप अंधकार का नाश कभी नहीं कर सकता। 

काल की परिभाषा

काल की परिभाषा      संसार के सभी दृश्य पदार्थ अर्थात् सभी ज्ञानेंद्रियों से जाने जा सकने वाले पदार्थ परिवर्तनशील है। इसी परिवर्तन के ज्ञान का जो हेतु है उसी को काल कहते हैं। जगत के परिणाम के मूल में काल की शक्ति क्रिया  करती है। चंचलताशून्य चित्तके सामने निरावरण प्रकाश का आविर्भाव होने पर विश्व में कुछ भी अप्रत्यक्ष नहीं रह सकता। तब सब कुछ वर्तमान रूप में उपलब्ध हो सकता है। काल परिणाम को लक्षण-परिणाम कहते हैं। अनागत, वर्तमान और अतीत -ये तीन लक्षण हैं। इनका त्रिकाल ( तीन कॉल )- के नाम से वर्णन किया जाता है। बुद्धि के बाहर कॉल नहीं है, क्रम है। जिसको ब्रह्मांड कहा जाता है, वह काल के आधीन है; क्योंकि इसकी भी सृष्टि, स्थिति और संहार है। ब्रह्मांड की संख्या असंख्य पर सर्वत्र यही नियम है।

वेद - विश्व की मूल धार्मिक पुस्तक

 वेद --मूल धार्मिक पुस्तक । मूल भारतिय निवा‌सियों आर्यों (हिन्दुओं) की मूल धार्मिक पुस्तक 'वेद' है। वेदोऽखिलो धर्ममूलम् , अर्थात सभी धर्मों का मूल वेद है। क्योंकि संसार में कोई भी ग्रंथ भारतीय मूल धर्म-ग्रंथ वेद से पुराना नहीं है।१० में से ५ भारतीय हिंदुओं को निश्चित रूप से यह ज्ञात नहीं होगा कि हमारी मूल धर्म की पुस्तक कौन सी है जबकि हम मुस्लिम धर्म के लोगों की धार्मिक किताब का नाम कुरान तुरंत बता देंगे और ईसाई धर्म के लोगों की धर्म की किताब बाईबिल का नाम तुरंत ले लेंगे। इसी प्रकार से अन्य धर्मों के लोगों के भी मूल धर्म की किताब का नाम तुरंत बता देंगे। जब हमारे मूल धर्म की पुस्तक का नाम आता है तो उसमें कोई रामायण, कोई महाभारत, कोई गीता, कोई उपनिषद् और कोई-कोई वेद को मूल धर्म की किताब मानते हैं, जबकि वास्तविकता यह है वास्तव में भारतीय आर्यों के धर्म की मूल पुस्तक वेद ही है, और इसका कोई रचयिता ईश्वर के अलावा नहीं है।
 वेद --मूल धार्मिक पुस्तक । मूल भारतिय निवा‌सियों आर्यों (हिन्दुओं) की मूल धार्मिक पुस्तक 'वेद' है। वेदोऽखिलो धर्ममूलम् , अर्थात सभी धर्मों का मूल वेद है। क्योंकि संसार में कोई भी ग्रंथ भारतीय मूल धर्म-ग्रंथ वेद से पुराना नहीं है।१० में से ५ भारतीय हिंदुओं को निश्चित रूप से यह ज्ञात नहीं होगा कि हमारी मूल धर्म की पुस्तक कौन सी है जबकि हम मुस्लिम धर्म के लोगों की धार्मिक किताब का नाम कुरान तुरंत बता देंगे और ईसाई धर्म के लोगों की धर्म की किताब बाईबिल का नाम तुरंत ले लेंगे। इसी प्रकार से अन्य धर्मों के लोगों के भी मूल धर्म की किताब का नाम तुरंत बता देंगे। जब हमारे मूल धर्म की पुस्तक का नाम आता है तो उसमें कोई रामायण, कोई महाभारत, कोई गीता, कोई उपनिषद् और कोई-कोई वेद को मूल धर्म की किताब मानते हैं, जबकि वास्तविकता यह है वास्तव में भारतीय आर्यों के धर्म की मूल पुस्तक वेद ही है, और इसका कोई रचयिता ईश्वर के अलावा नहीं है।

वेद की आज्ञा

🌿📚 वेद की आज्ञा 🔶  *पहली आज्ञा  :* 🔸  अक्षैर्मा दिव्य: (ऋ 10/34/13) 🔹  अर्थात् "जुआ मत खेलो ।" 🔶  *दूसरी आज्ञा  :* 🔸  मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः (ऋ 8/48/14) 🔹  अर्थात् "आलस्य, प्रमाद और बकवास हम पर शासन न करें ।" 🔶  *तीसरी आज्ञा  :* 🔸  सं गच्छध्वं सं वद्ध्वम (ऋ 10/191/2) 🔹  अर्थात् "मिलकर चलो और मिलकर बोलो ।" 🔶  *चौथी आज्ञा  :* 🔸  कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः            (अथर्व 7/50/8) 🔹 अर्थात् "मेरे दाएं हाथ में कर्म है और बाएं हाथ में विजय । 🔶  *पाँचवीं आज्ञा  :* 🔸  उतिष्ठत सं नह्यध्वमुदारा: केतुभिः सह ।         सर्पा इतरजना रक्षांस्य मित्राननु धावत ।।                     (अथर्व 11/10/1) 🔹  अर्थात् "हे वीर योद्धाओ ! आप अपने झण्डे को लेकर उठ खड़े हो और कमर कसकर तैयार हो जाओ । हे सर्प के समान क्रुद्ध रक्षाकारी विशिष्ट पुरुषों ! अपने शत्रुओं पर धाव...
मनु स्मृति--       मनुस्मृतिमें प्रक्षेप किए गए श्लोकों की भरमार है। प्रक्षेपण के कारण मनुस्मृति का उज्जवल रूप गंदा एवं विकृत हो गया है। परस्पर विरुद्ध प्रसंग विरोध एवं पक्षपात पूर्ण बातों से मनुस्मृति का वास्तविक स्वरूप और उसकी गरिमा विलुप्त हो गई है। इसके कारण इसके प्रति लोगों में अश्रद्धा की भावना घर करती जा रही है।         वैदिक विद्वानों के द्वारा (१) अंतर्विरोध या परस्पर विरोध, (२)प्रसंग विरोध, (३) विषय विरोध या प्रकरण विरोध, (४) अवांतर विरोध, (५) शैली विरोध, (६) पुनरुक्ति, (७)वेद विरोध। इन सभी मानदंडों एवं मनुस्मृति के अंतर साक्ष्य के आधार पर विस्तृत अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकाला है कि मनुस्मृति के 2685 उपलब्ध श्लोक में से 1471 श्लोक प्रक्षेपित हैं और 1214 श्लोक ही मौलिक पाए गए हैं। यद्यपि यह अंतिम नहीं है।    (टिप्पणी-प्रक्षिप्त श्लोकों की सूची अलग से दी जाएगी।)

ज्ञान

ज्ञान       लक्षण एवं प्रमाण के बिना कोई विद्वान किसी बात को स्वीकार नहीं कर सकता। बिना प्रमाण के किसी पदार्थ का ज्ञान संभव नहीं है और पदार्थ ज्ञान के बिना उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। क्योंकि ज्ञाता / जानने वाला प्रथम पदार्थ का ज्ञान करता है और तत्पश्चात उसको ग्रहण करने या छोड़ने की इक्षा करता है। यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह हिताहित को जानकर ही किसी भी कार्य को करता है। ज्ञान

धन-संपत्ति एवं सुख शांति का साधन

धन संपत्ति एवं सुख शांति का साधन       (संस्कृत भाषा का ज्ञान)  १- दुनिया पर राज करने वाला और कोई नहीं है। राज करने वाला केवल ज्ञान ही है। अतः जो ज्ञानी है वही राज करेगा। विश्व के सभी ज्ञान का मूल स्रोत वेद शास्त्र हैं  लेकिन वेद - विज्ञान के यथार्थ अध्ययन के लिए संस्कृत भाषा का यथेष्ट ज्ञान परमावश्यक है। संस्कृत भाषा ज्ञान शून्य संसार आर्ष ज्ञान के उत्कृष्ट प्रकाश से वंचित रहेगा। यदि हम इस वेद में निहित ज्ञान (विज्ञान) के किसी अंश को टेक्नोलॉजी में बदल लें तो हमें अपार धन-संपत्ति उसी से प्राप्त हो सकती है। उदाहरण के लिए स्वामी रामदेव जी का और बालकृष्ण जी का योग और आयुर्वेद प्रत्यक्ष है।

वैदिक विज्ञान

  यदि हम ब्रह्म, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, ब्रह्मांड, सत्य, इस अनंत ब्रह्मांड के बाहर क्या है ? यह ब्रह्मांड कब कहां कैसे पैदा हुआ? कब समाप्त होगा? उसके पहले क्या था ? उसके बाद क्या रहेगा? हम कहां से आए हैं?कहां जाएंगे ? मुक्ति या मोक्ष क्या है? इन प्रश्नों के  तथा इस प्रकार के अनंत प्रश्न जो हमारे मस्तिष्क में दिन प्रतिदिन उठते रहते हैं। इन प्रश्नों के बारे में यदि ठीक ठीक जानने का प्रयास करते हैं, तो हमें वैदिक विज्ञान या  विचारधारा का प्राचीन भारतीय ग्रंथों- वेद, उपनिषद, और दर्शन आदि आर्ष ग्रन्थों के सत्य ज्ञान का सहारा लेना ही पड़ेगा।

चेतना/जीव

चेतन जीव से ही पदार्थ की उत्पत्ति होती है , जबकि आधुनिक वैज्ञानिक पदार्थ से जीव/ चेतना की उत्पत्ति मानते हैं। सामान्य रूप से यह देखने में आता है कि शरीर में ही चेतन सत्ता से बाल और नाखून जैसे पदार्थ जिनमें चेतना नहीं होती है पैदा होते हैं। जबकि बाल या नाखून से किसी जीवित वस्तु का निर्माण या उसमें चेतना नहीं पैदा होती। शरीर के सेल ( कोष) चेतन सत्ता से ही पैदा होते रहते हैं और बाद में नष्ट होते रहते हैं जबकि नष्ट सेल (कोषों) से किसी जीव या जीवित वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती है। जहां भी चेतना का निर्माण होता है वहां चेतना ही होती है। जब चेतना अपना अस्तित्व सिकोड़ती है तो शेष रूप में अचेतन पदार्थ ही बच रहता है।