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Showing posts from November, 2019

योगाभ्यास

योगाभ्यास        न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु: ।          प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ।।( श्वे०- २/१२) ।।      अर्थात् :- योगान्गिमय शरीर जिसको प्राप्त होता है, उसे कोई रोग नहीं होता, बुढ़ापा नहीं आता और मृत्यु भी नहीं होती।

हमारा नेता कैसा हो?

क) - मां न: स्तेन ईशत ।। ऋ० ४२/३ ।।     अर्थात् - चोर तथा दुष्ट व्यक्ति हमारे ऊपर अधिकार न करें।        (ख) - मां व स्तेनs ईशत ।। यर्जु० - १/१।।     अर्थात्-दुष्ट पुरुष के संरक्षण में न रहें।

महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युञ्जय मंत्र         त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।         उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।             (ऋग्वेद ७।५९।१२) (शुक्ल यजुर्वेद ३।६०)      अर्थात-      हम त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर की पूजा करते हैं, मंत्यधर्म से (मरणशील मानवधर्म मृत्यु से) रहित दिव्य सुगन्धि से युक्त, उपासकों के लिये धन-धान्य आदि पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। वे त्रिनेत्रधारी उर्वारुक (कर्कटी या ककड़ी-जो पकने पर स्वतः पौध से अलग हो जाती है) फल की तरह हम सबको अपमृत्यु या सांसारिक मृत्यु से मुक्त करें। स्वर्गरूप या मुक्तिरूप अमृत से हमको न छुड़ायें अर्थात् अमृत-तत्व से हम उपासकों को वंचित न करे ।
यज्ञ कर्म-१(प्रदूषण समाधान)     तेजी से बढ़ते हुए प्रदूषण को कम करने अथवा समाप्त करने का एकमात्र साधन है यज्ञ कर्म तथा अग्निहोत्र। इनके बारे में हमारे शब्द प्रमाणों (वेद, उपनिषद, गीता) आदि वैदिक ग्रंथों एवं शास्त्रों में भूरी भूरी प्रशंसा की गई है तथा इन्हें करने के लिए आवश्यक निर्देश भी दिए गए हैं। यज्ञों के संबंध में वैज्ञानिक प्रयोगों से इस बात की पुष्टि हुई है की यज्ञादि कर्म पर्यावरण के प्रदूषण को कम करके इसे शुद्ध करते हैं तथा मानव जीवन के लिए स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। जो विद्वान व्यक्ति इस कथन को नहीं मानता उसको चाहिए कि वह प्रदूषण मापक यंत्रों के माध्यम से पहले इसकी विधिवत जांच भी करावे तथा उसका जो भी परिणाम हो उसे भी समाज को बतावे।

यज्ञ कर्म-१:

यज्ञ कर्म-१    १- प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रच कर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।    सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: ।    अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्ति्वष्टकामधुक् ।।         (गीता-३/१०)

आचारवांन होना

मनुष्य को आचारवान होना जरूरी है, ज्ञानवान होना उतना जरूरी नहीं है। आचार का अर्थ है, उसका आचरण सभी ओर से नियंत्रित और शास्त्रानुकूल और धर्मानुकूल होना चाहिए, उसमें नैतिकता होनी चाहिए। नैतिकता का अर्थ है नीति का अनुसरण करने वाला।

मनुष्य का आचरण

मनुष्य को आचारवान होना जरूरी है, ज्ञानवान होना उतना जरूरी नहीं है। आचार का अर्थ है, उसका आचरण सभी ओर से नियंत्रित और शास्त्रानुकूल और धर्मानुकूल होना चाहिए, उसमें नैतिकता होनी चाहिए। नैतिकता का अर्थ है नीति का अनुसरण करने वाला।

ज्ञान की अवस्था

ज्ञान होते ही हमारे सामने से अज्ञान का पर्दा हट जाता है, और शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार का संसार जो दिखाई पड़ रहा था वह सब समाप्त हो जाता है। वैसे ही जैसे स्वपनावस्था से जागृत होने पर स्वप्न की अवस्था का संसार समाप्त हो जाता है।

मन का प्रशिक्षण

मन का प्रशिक्षण ‌      किसी भी यंत्र को उत्तम रूप से चलाने के लिए उचित एवं पर्याप्त प्रशिक्षण तथा लगातार अभ्यास की जरूरत पड़ती है। उसी प्रकार बचपन से ही मन को भी उचित ढंग से चलाने के लिए प्रशिक्षण की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।

कर्म एवं भाग्य

पूर्व जन्मों के कर्मों से अर्जित अच्छा बुरा कर्म फल ही इस जन्म का दैव(भाग्य) कहलाता है, और जो इस जन्म में जो अच्छे बुरे कर्म करते हैं यही पुरुषार्थ है। इन्ही दोनों के बला-बल के आधार पर ही हमें इस जन्म में आयु और भोग प्राप्त होता है। अतः ये सदा निश्चित नहीं रहता है। अर्थात् इस जन्म में किया गया अच्छा कर्म और पुरुषार्थ पिछले जन्म के कर्म और पुरुषार्थ से प्राप्त हुए बुरे फल अर्थात अनिष्ट दैव (भाग्य) से बलवान पड़कर अच्छे फल दे सकता है।

ब्रह्म

ब्रह्म किसी का विशेषण नहीं है न तो उसका कोई विशेषण है सत्यम्- ज्ञानम्- अनन्तम् स्वयं ही ब्रह्म है। ब्रह्म से यह गुण अलग नहीं है, जैसे सूर्य प्रकाशक है, यह सही नहीं है सूर्य के सामने जो पड़ता है, वह प्रकाशित होता है। जैसे चंदन की गंध चंदन से अलग नहीं होती है। चंदन की गंध भी चंदन ही है। इसीलिए ब्रह्म को जानने के बाद कुछ जानने को शेष नहीं बचता है।

दुख का मूल कारण

ईश्वर की कही हुई चारों (संहिता) वेद हैं । वेद ही स्वयं प्रमाण है और वे ही मुख्य शब्द प्रमाण हैं। उपनिषद गीता एवं भारतीय दर्शन में इन्हीं की विवेचना है। वेद ही सब सत्य विद्या है, अतः विना सत्य-विद्या के ज्ञान कहां? बिना ज्ञान के उन्नति कैसी ? और उन्नति के न  होने से मनुष्य सदा दुख: सागर में ही डूबे रहते हैं। इस प्रकार अज्ञान ही दु:ख और कष्ट का मूल कारण है।

ज्ञान योग

ज्ञान योग      ज्ञान योग, कर्म योग तथा भक्ति योग में क्या अंतर है ?ज्ञान योग में ज्ञान की प्रमुखता होती है, और कर्म योग तथा भक्ति योग में एक निश्चय की प्रमुखता होती है।(गीता)