Posts

बीमारी

बीमारी       बीमारी  पाप है।  यदि संसार में  पाप न हो तो बीमारी भी नहीं होगी।‌ यह मानी हुई बात है की मानसिक विकार- स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, अनुदारता, असंयम और क्रोध आदि का भयंकर प्रभाव शरीर और मन पर पड़ता है  वही धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक बीमारी पैदा करता है।

आत्मविश्वास

  मनुष्य अपनों से हारने में खुशी अनुभव करता है, परंतु यदि अपने से हार जाता है तो  उससे उसका आत्मविश्वास कम हो जाता है, कमजोर पड़ जाता है। यहीं से उसके जीवन में हार प्रारंभ हो जाती है।

समाधि

  समाधि:-        प्रगाढ़ ध्यान की अवस्था ही समाधि है, या इसे ऐसे कह सकते हैं कि एकाग्रता की पराकाष्ठा समाधि है।    समाधि की अवस्था में ध्यान में कोई विषय नहीं रहता और ध्यान एक ही बिंदु पर एकाग्र होता है। शरीर तथा मन में स्थिरता बनी रहती है। समाधि निद्रा से अलग है निद्रा में शरीर शिथिल हो जाता है और शारीरिक चैेतन्यता शिथिल पड़ जाती है। जबकि समाधि की अवस्था में शारीरिक शिथिलता नहीं रहती है परंतु ध्यान एक ही स्थान पर एकाग्र रहता है।  चंचलता सून्य समाधि अवस्था में चित्त के सामने निरावरण प्रकाश का आविर्भाव होने पर विश्व में कुछ भी अप्रत्यक्ष नहीं रह जाता है तब सब कुछ नित्य वर्तमान रूप में उपलब्ध हो सकता है।
हिन्दु कौन?    हिंन्दू कौन?     जो वेदों में और वैदिक सनातन धर्म में आस्था रखता है, वेदों में जो करने योग्य कार्य बतलाये गये हैं उन्ही को धार्मिक कार्य तथा वेदों में जो त्याज्य कर्म बतलाया गए हैं उनको अधर्म मानता है, वास्तव में वही आर्य तथा वर्तमान में उसी को हम वास्तविक सही मायने में हिंदू मानते हैं।     हिंदू शब्द हमारे प्राचीन भारत में वैदिक साहित्य में कहीं प्रचलित नहीं रहा है। हिंदू शब्द भारतीय इतिहास में अपेक्षाकृत बहुत अर्वाचीन है।

भारतीय दिनदर्शिका या संकल्प मंत्र

संकल्प मंत्र-    ॐ विष्णुर्विष्णुविर्ष्णु ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे उत्तर प्रदेश, ८-ए, लक्ष्मणपुरी फैजाबाद  मार्ग, लखनऊ स्थान नामे -----परिधावी नाम विक्रमसंवत्सर २०७६  चैत्र मासे शुक्ल  पक्षे प्रतिपदा  तिथौ-शैनेश्चर वासरे कश्यप गोत्र:ऽहम्  गोपाल कृष्ण सिंह सपरिवारस्य प्रात: ( मध्याह्ने- सायं) सिद्ध्यर्थश्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्प्रीत्यर्थं  च - -----(अमुक) कर्म करिष्ये ।

उपवास

उपवास    प्रत्येक मनुष्य को उपवास नियम से अवश्य करना चाहिए। उप का अर्थ है निकट और वास का अर्थ है रहना। इस प्रकार मनुष्य उपवास में अपने आत्म-तत्व के निकट पहुंचता जाता है। लगभग दुनिया के सभी धर्मों में उपवास रखना जरूरी बताया गया है। उपवास के समय(पेट को खाली रखकर) हम पंच तत्वों में से आकाश तत्व (शून्य) का सेवन करते हैं। पंचतत्व में सर्वप्रथम आकाश तत्व ही उत्पन्न हुआ है और उसके पश्चात उसी से अन्य तत्व (सभी कुछ) भी पैदा हुए हैं। उपवास में शरीर स्वयं ही वह दवा उत्पन्न करता है जो शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। उपवास से ही मनुष्य की आयु बढ़ती है। स्वस्थ व्यक्ति ही ईश्वर की प्रार्थना विधिवत कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही उत्कृष्ट ज्ञान (बौद्धिक ज्ञान) का अर्जन कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही अपने कार्य को कुशलता पूर्वक कर सकता है। हम सामान्य रूप से यह स्वयं देखते हैं कि पेट भर जाने पर आलस्य अथवा निद्रा आने लगती है, जबकि खाली पेट रहने पर बौद्धिक स्तर का कार्य भली प्रकार कर सकते हैं और अन्य कार्य भी कुशलता पूर्वक कर लेते हैं। पेट भरा होने पर शरीर के सभी आवश्यक अंग केवल खाना पचाने...

ईश्वर का अनुभव कैसे करें

ईश्वर को अनुभव करने के लिए गुड कंडक्टर होना आवश्यक है बैड कंडक्टर होने से ईश्वर का अनुभव नहीं हो पाता। बैड कंडक्टर का अर्थ नकारात्मकता भाव या नास्तिकता का भाव। यह भाव भी कुछ दिन बाद प्रयास से धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।