उपवास
उपवास
प्रत्येक मनुष्य को उपवास नियम से अवश्य करना चाहिए। उप का अर्थ है निकट और वास का अर्थ है रहना। इस प्रकार मनुष्य उपवास में अपने आत्म-तत्व के निकट पहुंचता जाता है। लगभग दुनिया के सभी धर्मों में उपवास रखना जरूरी बताया गया है। उपवास के समय(पेट को खाली रखकर) हम पंच तत्वों में से आकाश तत्व (शून्य) का सेवन करते हैं। पंचतत्व में सर्वप्रथम आकाश तत्व ही उत्पन्न हुआ है और उसके पश्चात उसी से अन्य तत्व (सभी कुछ) भी पैदा हुए हैं। उपवास में शरीर स्वयं ही वह दवा उत्पन्न करता है जो शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। उपवास से ही मनुष्य की आयु बढ़ती है। स्वस्थ व्यक्ति ही ईश्वर की प्रार्थना विधिवत कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही उत्कृष्ट ज्ञान (बौद्धिक ज्ञान) का अर्जन कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही अपने कार्य को कुशलता पूर्वक कर सकता है। हम सामान्य रूप से यह स्वयं देखते हैं कि पेट भर जाने पर आलस्य अथवा निद्रा आने लगती है, जबकि खाली पेट रहने पर बौद्धिक स्तर का कार्य भली प्रकार कर सकते हैं और अन्य कार्य भी कुशलता पूर्वक कर लेते हैं। पेट भरा होने पर शरीर के सभी आवश्यक अंग केवल खाना पचाने में लग जाते हैं, और अन्य कार्यों में शरीर शिथिल पड़ जाता है। हमारा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि केवल उपवास ही रखा जाए। भोजन करना भी अति आवश्यक है। लेकिन भोजन नियम से किया जाए एवं दिन में 2 बार (केवल सुबह - शाम) से अधिक भोजन करना निषिद्ध है मनुस्मृति (२/५५) में भी यही लिखा हुआ है। उपवास सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार या कम से कम 1 माह में एक बार अवश्य, तथा विशेष पर्वो या त्योहारों में भी रखा जा सकता है।
प्रत्येक मनुष्य को उपवास नियम से अवश्य करना चाहिए। उप का अर्थ है निकट और वास का अर्थ है रहना। इस प्रकार मनुष्य उपवास में अपने आत्म-तत्व के निकट पहुंचता जाता है। लगभग दुनिया के सभी धर्मों में उपवास रखना जरूरी बताया गया है। उपवास के समय(पेट को खाली रखकर) हम पंच तत्वों में से आकाश तत्व (शून्य) का सेवन करते हैं। पंचतत्व में सर्वप्रथम आकाश तत्व ही उत्पन्न हुआ है और उसके पश्चात उसी से अन्य तत्व (सभी कुछ) भी पैदा हुए हैं। उपवास में शरीर स्वयं ही वह दवा उत्पन्न करता है जो शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। उपवास से ही मनुष्य की आयु बढ़ती है। स्वस्थ व्यक्ति ही ईश्वर की प्रार्थना विधिवत कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही उत्कृष्ट ज्ञान (बौद्धिक ज्ञान) का अर्जन कर सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही अपने कार्य को कुशलता पूर्वक कर सकता है। हम सामान्य रूप से यह स्वयं देखते हैं कि पेट भर जाने पर आलस्य अथवा निद्रा आने लगती है, जबकि खाली पेट रहने पर बौद्धिक स्तर का कार्य भली प्रकार कर सकते हैं और अन्य कार्य भी कुशलता पूर्वक कर लेते हैं। पेट भरा होने पर शरीर के सभी आवश्यक अंग केवल खाना पचाने में लग जाते हैं, और अन्य कार्यों में शरीर शिथिल पड़ जाता है। हमारा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि केवल उपवास ही रखा जाए। भोजन करना भी अति आवश्यक है। लेकिन भोजन नियम से किया जाए एवं दिन में 2 बार (केवल सुबह - शाम) से अधिक भोजन करना निषिद्ध है मनुस्मृति (२/५५) में भी यही लिखा हुआ है। उपवास सप्ताह में एक बार या पक्ष में एक बार या कम से कम 1 माह में एक बार अवश्य, तथा विशेष पर्वो या त्योहारों में भी रखा जा सकता है।
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