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आत्मविश्वास

  मनुष्य अपनों से हारने में खुशी अनुभव करता है, परंतु यदि अपने से हार जाता है तो  उससे उसका आत्मविश्वास कम हो जाता है, कमजोर पड़ जाता है। यहीं से उसके जीवन में हार प्रारंभ हो जाती है।

समाधि

  समाधि:-        प्रगाढ़ ध्यान की अवस्था ही समाधि है, या इसे ऐसे कह सकते हैं कि एकाग्रता की पराकाष्ठा समाधि है।    समाधि की अवस्था में ध्यान में कोई विषय नहीं रहता और ध्यान एक ही बिंदु पर एकाग्र होता है। शरीर तथा मन में स्थिरता बनी रहती है। समाधि निद्रा से अलग है निद्रा में शरीर शिथिल हो जाता है और शारीरिक चैेतन्यता शिथिल पड़ जाती है। जबकि समाधि की अवस्था में शारीरिक शिथिलता नहीं रहती है परंतु ध्यान एक ही स्थान पर एकाग्र रहता है।  चंचलता सून्य समाधि अवस्था में चित्त के सामने निरावरण प्रकाश का आविर्भाव होने पर विश्व में कुछ भी अप्रत्यक्ष नहीं रह जाता है तब सब कुछ नित्य वर्तमान रूप में उपलब्ध हो सकता है।
हिन्दु कौन?    हिंन्दू कौन?     जो वेदों में और वैदिक सनातन धर्म में आस्था रखता है, वेदों में जो करने योग्य कार्य बतलाये गये हैं उन्ही को धार्मिक कार्य तथा वेदों में जो त्याज्य कर्म बतलाया गए हैं उनको अधर्म मानता है, वास्तव में वही आर्य तथा वर्तमान में उसी को हम वास्तविक सही मायने में हिंदू मानते हैं।     हिंदू शब्द हमारे प्राचीन भारत में वैदिक साहित्य में कहीं प्रचलित नहीं रहा है। हिंदू शब्द भारतीय इतिहास में अपेक्षाकृत बहुत अर्वाचीन है।