ज्ञान होते ही हमारे सामने से अज्ञान का पर्दा हट जाता है, और शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार का संसार जो दिखाई पड़ रहा था वह सब समाप्त हो जाता है। वैसे ही जैसे स्वपनावस्था से जागृत होने पर स्वप्न की अवस्था का संसार समाप्त हो जाता है।
मनुष्य अपनों से हारने में खुशी अनुभव करता है, परंतु यदि अपने से हार जाता है तो उससे उसका आत्मविश्वास कम हो जाता है, कमजोर पड़ जाता है। यहीं से उसके जीवन में हार प्रारंभ हो जाती है।
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