ब्रह्म एवं जीव

ब्रह्म  एवं  जीव
      भूमिरापोऽनलो  वायु: खं मनो बुद्धिरेव च ।
       अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना  प्रकृतिरष्टधा ।।
  अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
     जीवभूतां महाबाहो  ययेदं धार्यते जगत्।।
      ( गीता- ७/४-५)
     अर्थात् :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी- इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदोंवाली तो अपरा अर्थात्  मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो!  इससे दूसरी को,  जिससे यह संपूर्ण जगत् धारण किया जाता है, मेरी जीव रूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान।
   टिप्पणी-- यही नौ प्रकार की प्रकृति जीव के पास भी है केवल अंतर इतना है की ईश्वर भूमा है, जबकि जीव अल्प है। यह ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे ईश्वर को यदि सागर माना जाए तो जीव उसकी एक बूंद के कण के समान है।

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