ज्ञान
ज्ञान
लक्षण एवं प्रमाण के बिना कोई विद्वान किसी बात को स्वीकार नहीं कर सकता। बिना प्रमाण के किसी पदार्थ का ज्ञान संभव नहीं है और पदार्थ ज्ञान के बिना उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। क्योंकि ज्ञाता / जानने वाला प्रथम पदार्थ का ज्ञान करता है और तत्पश्चात उसको ग्रहण करने या छोड़ने की इक्षा करता है। यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह हिताहित को जानकर ही किसी भी कार्य को करता है। ज्ञान
लक्षण एवं प्रमाण के बिना कोई विद्वान किसी बात को स्वीकार नहीं कर सकता। बिना प्रमाण के किसी पदार्थ का ज्ञान संभव नहीं है और पदार्थ ज्ञान के बिना उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। क्योंकि ज्ञाता / जानने वाला प्रथम पदार्थ का ज्ञान करता है और तत्पश्चात उसको ग्रहण करने या छोड़ने की इक्षा करता है। यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह हिताहित को जानकर ही किसी भी कार्य को करता है। ज्ञान
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